रोड के किनारे नमकीन-बिस्कुट बेचने कर जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, 28 स्वर्ण पदक जीतने वाली अंतरराष्ट्रीय पैरा शूटर

 

जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश में क्रिकेट को सबसे ज्यादा तवज्जो दिया जाता है। किसी अन्य खेलों पर उतना ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। उत्तराखंड के देहरादून में एक ऐसा ही जीता जागता उदाहरण देखने को मिला।

देश की पहली महिला पैरा शूटिंग चैम्पियन सड़क पर बेच रही नमकीन-बिस्किट -  country s first female para shooting champion selling biscuit on the road -  Sports Punjab Kesari

दरअसल हम बात कर रहे हैं अंतर्राष्ट्रीय महिला पैराशूट दिलराज कौर के बारे में, जिन्होंने फुटपाथ पर केवल नमकीन चिप्स और बिस्किट बेचकर अपने रोजगार को चलाया है। बता दें कि इस गंभीर बात पर खेल मंत्री या देश शर्म करें या फिर नाच लेकिन यह बात बिल्कुल ही सच है।

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भारत की देहरादून में रहने वाली पहली दिव्यांग निशानेबाज दिलराज कौर को काफी पारिवारिक संकट का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनकी आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं है।

Dilraj Kaur | चिप्स बेचने को मजबूर गोल्ड मेडल जीतने वालीं पैरा शूटर दिलराज  कौर | Para Shooter Dilraj Kaur Struggles To Make Ends Meet

आपको जानकर हैरानी होगी कि कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 34 वर्षीय दिलराज कौन हिस्सा लेने के बाद भी वह देहरादून, उत्तराखंड, और गांधी पार्क जैसी जगहों पर खाने का सामान बेच कर अपना जीवन पालन कर रहे हैं।

उत्तराखंडः पहली महिला पैरा शूटिंग चैंपियन सड़क पर नमकीन-बिस्किट बेचने को  मजबूर, जानें क्या है कहानी? - india first international para shooter dilraj  kaur selling namkeen ...

दिलराज कौर केवल हिस्सा लेने वाली प्रतियोगी नहीं बल्कि पैरालंपिक शूटिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने एक रजत पदक और राष्ट्रीय स्तर पर 24 स्वर्ण पदक जीते इन सबके अलावा भी उन्होंने कई पदक जीते।

The Tribune, Chandigarh, India - Dehradun Plus

लेकिन अभी वह अपनी मां के साथ देहरादून में एक किराए के मकान में रह रहे हैं। बता दें कि पिता और भाई के मौत के बाद उन्हें काफी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

International shooter dilraj kaur struggling for two times bread

उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि उन्होंने घर चलाने के लिए चिप्स बेचना शुरू कर दिया। देश की जरूरत के समय दिलराज कौर देश के साथ थी लेकिन उनके जरूरत के वक्त किसी ने उनका साथ नहीं दिया। पिता और भाई के बीमार होने के कारण सारी सेविंग उनमें ही खर्च हो गई।

Gaurav Gera (@gauravgera) | Twitter

भाई के इलाज में करोड़ों खर्च होने के बाद भी उनकी मृत्यु हो गई तथा उसके बाद दिलराज और उसकी माता कर्ज में डूब गई और जैसे तैसे अपनी जिंदगी गुजार रही है। बता दें कि उनका कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति को देख सरकार को उन्हें सरकारी नौकरी देनी चाहिए।

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